पत्थर वरहे जो मेरे घर ’ते, उह विहड़े विचकार गिरे।
रुख्ख ते सी पर जिंने वी फ़ळ, उह दीवारों पार गिरे।
दुशमण भावें पत्थर मारे, पैरां हेठां अग्ग धरे,
सज्जण दा पर कोसा अत्थरू हो के ठंडा ठार गिरे।
धरती वंडी पाणी वंडिआ, अंबर वी तां वंड लिआ,
किउं नां साथों नफ़रत वाळी, इह चंदरी दीवार गिरे।
दिसहद्दे तक्क मारूथल है, नीर तां किधरे लभ्भे नां,
ऊठां वाळे तुरदे-तुरदे, राह विच्च किंनी वार गिरे।
अपणा भावें फ़ुल्ल वी मारे, तां वी रूह कुरलाअ उठदी,
अख्खीआं विच्चों पत्थर वरगा, अत्थरू ज़ारो-ज़ार गिरे।

