अक्टूबर 30, 2009

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By: सुखमिंदर रामपुरी

कद टलण वाळे हां असीं‎...

कद टलण वाळे हां असीं‎,‎ चल्ले हो टाळ के।

चल्ले किधर नूं हो तुसीं‎,‎ सुपने दिखाळ के।

बखशी नां दात रब्ब नें‎,‎ गा गा के लिखण दी‎,‎

मैं पाळिआ हुनर मसां‎,‎ सौ जफर जाळ के।

पहड़के पछाण लैण गे‎,‎ तेरा मुहांदरा‎,‎

गज़लां `च नाकश मैं तिरे‎,‎ चल्लिआं संभाल के।

ढहिंदी कला नूं छड्ड‎,‎ बल धार लै मना‎,‎

पाइंगा मंज़लां किवें‎,‎ लत्तां निसाल के।

धरती `ते डिगण नां दवे‎,‎ सागर कमाल है‎,‎

सूरज दी गेंद बोचदा‎,‎ है इओं उछाल के।

ढेरी ढाह के बहिण दा‎,‎ जो आदी है ओस नूं‎,‎

तेरी सुगंद दम लवांगा‎,‎ मैं उठाल के।

पूनम दा चंन अपणे‎,‎ केसां `च टुंग के‎,‎

इतरा रही ए रातरी‎,‎ मैनूं दिखाल के।

सुखमिंदरा उह लोकता दे‎,‎ बणन गे चिराग;

सूरज दी सोच रख्खदे जो‎,‎ मसतक विच्च पाळ के।

कद टलण वाळे हां असीं‎,‎ चल्ले हो टाळ के।

चल्ले किधर नूं हो तुसीं‎,‎ सुपने दिखाळ के।