अगस्त 21, 2026

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By: सुरजीत पातर

कल्ल रातीं कुझ लक्कड़हारे

कल्ल रातीं कुझ लक्कड़हारे

काले वण चों लंघ रहे सन

सावे सावे बिरखां कोलों

बलदा चुल्ल्हा मंग रहे सन

किहड़े सेक नें इउं पिघलाए

पाणी नीवें उत्तर आए

धरत सुहागण दे पोरां नूं

कतरा कतरा अंग रहे सन

लंघदे नंगे बाज़ारां 'चों

आउंदे वारिस जांदे पुरखे

उहले उहले बचदे फिरदे

इक दूजे तों संग रहे सन

लोहे नूं हथिआर बणा के

बंदे भुख्ख पिआस मिटा के

आपे घड़ीआं मूरतीआं तों

रो रो माफी मंग रहे सन

इक बंदे दे हुकम दे बध्धे

इक नूं सूली टंग रहे सन

किंने कोलों दुख्ख 'च डुब्बे

चुप चुपीते लंघ रहे सन

अरश 'ते तारे धरत 'ते अख्खर

चमक रहे सन रात बराते

सन कुझ लोक जो काइनात नूं

पिआर दे रंग 'च रंग रहे सन