अक्टूबर 27, 2009

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By: संदीप धनोआ

बेनाम

बंद होठां दे बूहे पिछ्छे‎,‎ खामोश ते गुंमनाम बोल
आवाज़ दे दे मालका‎,‎ नहीं सहिकदे रहि जाणगे।

सुपने विच्च वी किंझ कहां‎,‎ “रहिनुमा मेरे नाल चल्ल”‎,
‎  जो मेरे पिछ्छों आउणगे‎,‎ राह भटकदे रहि जाणगे।

मेरी सोच जेकर मेरिआं नैणां `ते आ के मुक्क गई
लहिरां दे ख़ाब कंढे उत्ते‎,‎ डुब्ब के मर जाणगे।

आ‎,‎ अग्ग बणके चीरदे‎,‎ तूं चिणग दी इस चीक नूं
दिन-दिहाड़े मासूम वी‎,‎ जुगनूं तों डरदे रहिणगे।

संनह ला के हत्थीं लुट्टी‎,‎ धरती पहिरेदारां नें‎,‎
उह जो शहिनशाह सुत्ते पए‎,‎ सुत्ते ही सुत्ते रहिणगे।

भीड़ी जिही इस भीड़ नूं‎,‎ पब्बां `ते पार कर लवीं‎,‎
नां तक्कीं सज्जे-खब्बे तूं‎,‎ धक्के ही पैंदे रहिणगे।

नां दोसतां दी थोड़ दिल `च‎,‎ नां दुशमणां दी लोड़्ड़ है‎,‎
बेनाम जिहे कुझ्झ हादसे‎,‎ सभ तों करीब रहिणगे।